भाई-बहन के प्यार पर भारी पड़ा भारत-पाक विवाद!
बाड़मेर.भारत-पाक के बीच वर्ष 1971 में जंग छिड़ने के बाद पाकिस्तान छोड़ हिंदुस्तान आकर बस गई एक महिला को 42 साल के इंतजार के बाद भी भाई का हाथ राखी बांधने के लिए नसीब हो सका।
इस साल उसके भाई ने हिंदुस्तान आने के साथ राखी बंधवाने का वादा किया था, मगर राखी से पहले ही बहना भगवान को प्यारी हो गई। शहर के बेरियों का वास में रहने वाली गवरी देवी पत्नी गोरधन लाल त्रिवेदी ने बीती 25 जुलाई को भाई के इंतजार में अंतिम सांस ली।
दो देशों के विवाद ने रिश्तों की बढ़ाई दूरी
पाकिस्तान में हिंदुओं पर बढ़ते अत्याचार के बाद गवरी देवी का परिवार बाड़मेर आकर बस गया। जमीन-जायदाद छोड़ भारत आए इन परिवारों को सबसे ज्यादा नुकसान इस बात का हुआ कि इनके कुछ रिश्तेदार वहीं रह गए। ऐसे में दोनों ओर के रिश्तेदारों को आपस में मिलने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा।
गवरी के भाई राणूलाल ओझा का परिवार सिंध प्रांत के चेल्हार (छाछरो) में ही रह गया। वीजा नहीं मिलने के चक्कर में गवरी का भाई चाहते हुए भी भारत नहीं आ सका। गवरी का पुत्र श्रवण त्रिवेदी बताता है कि उसकी मां हर रक्षाबंधन पर यही कहती, ‘मोंझे भाई रे रखड़ी बंधणी है..’। लेकिन एक बार बिछड़ने के बाद फिर कभी वह अपने भाई को राखी बांध नहीं पाई।
ऐसे कई उदाहरण:
जंग के वक्त ज्यादातर हिंदू परिवार सुरक्षा कारणों के चलते बाड़मेर व जैसलमेर आकर बस गए। इनके कई परिवार वहीं रह गए और इनके रिश्तों के बीच तारबंदी आ गई। ऐसे में आज भी कई बहन व भाई आज भी रक्षाबंधन के इंतजार में ही रहते है। हालांकि अब बाड़मेर बॉर्डर से थार एक्सप्रेस व वाघा बॉर्डर के रास्ते शुरू हुई बस सेवा से दो देशों के बिछड़े परिवार मिलने लगे हैं।
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